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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Tunnavaaya   to Daaruka )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar)

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Tunnavaaya - Tulaa ( words like Tumburu, Turvasu, Tulasi, Tulaa/balance etc.)

Tulaa - Triteeyaa (Tushaara, Tushita, Tushti/satisfaction, Trina/straw, Trinabindu, Triteeya/third day etc. )

Triteeyaa - Taila  (Trishaa/thirst, Trishnaa/craving, Teja/brilliance, Taittira, Taila/oil etc.)

Taila - Trayyaaruna ( Tondamaana, Torana, Toshala, Tyaaga, Trayee, Trayodashee, Trayyaaruna etc.)

Trasadashva - Tridhanvaa  ( Trasadasyu, Trikuuta, Trita, Tridhanvaa etc.)

Tridhaamaa - Trivikrama  (Trinetra, Tripura, Trivikrama etc. )

Trivishta - Treeta (Trivishtapa, Trishanku, Trishiraa, Trishtupa etc.)

Tretaa - Tvishimaan (Tretaa, Tryambaka, Tvaritaa, Twashtaa etc.)

Tvishta - Daksha ( Danshtra/teeth, Daksha etc. )

Daksha - Danda (Daksha, Dakshasaavarni, Dakshina/south/right, Dakshinaa/fee,   Dakshinaagni, Dakshinaayana etc. )

Danda - Dattaatreya (Danda/staff, Dandaka, Dandapaani, Dandi, Dattaatreya etc.)

Dattaatreya - Danta ( Dattaatreya, Dadhi/curd, Dadheechi/Dadhichi, Danu, Danta/tooth etc.)

Danta - Damayanti ( Danta / teeth, dantakaashtha, Dantavaktra / Dantavakra, Dama, Damana, Damaghosha, Damanaka , Damayanti etc. )

Damee - Dashami  ( Dambha/boasting, Dayaa/pity, Daridra/poor, Darpana/mirror, Darbha,  Darsha, Darshana, Dashagreeva etc.)

Dasharatha - Daatyaayani (Dashami/tenth day, Dasharatha, Dashaarna, Dashaashvamedha etc. )

Daana - Daana ( Daana)

Daanava - Daaru (Daana, Daama, Daamodara etc.)

 

 

तुला

टिप्पणी

आश्विन् व कार्तिक मासों में सूर्य क्रमशः कन्या व तुला राशि में स्थित होता है। आश्विन् मास का एक नाम इष है तथा कार्तिक मास का नाम ऊर्ज है। इषम् अन्न को भी कहते हैं तथा इष धातु इच्छा अर्थ में भी है। इष का अर्थ होगा द्युलोक से वर्षा द्वारा कामनाओं की पूर्ति। ऊर्ज का अर्थ होता है वह ऊर्जा जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के विपरीत दिशा में गति करके द्युलोक तक पहुंच जाती है। इस पृथिवी पर जितनी ओषधियां विद्यमान हैं, वह सब ऊर्ज का रूप हैं। वैदिक साहित्य में ऊर्ज को रथंतर कहा गया है। रथंतर का अर्थ है यह पृथिवी जो द्युलोक से वर्षा के रूप में सारी कामनाओं को प्राप्त करती है, द्युलोक को बदले में क्या देती है। कहा गया है कि यह देवयजन देती है। चन्द्रमा में जो कृष्ण भाग दिखाई देता है, वह यही देवयजन है। देवयजन का ठीक ठीक अर्थ क्या हो सकता है, इस विषय में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन देवयजन का अर्थ देव प्राणों को प्रतिष्ठित होने के लिए आधार प्रदान करना हो सकता है। श्री अरविन्द इस तथ्य पर बहुत बल देते हैं कि पृथिवी पर जो अतिमानव का अवतरण होगा, उसके लिए हमें  भूमिका तैयार करनी होगी। यही वैदिक साहित्य का देवयजन हो सकता है। रजनीश ने इसी तथ्य को कृष्णामूर्ति के उदाहरण द्वारा लिया है कि किस प्रकार थियोसोफिकल सोसाईटी ने कृष्णामूर्ति को अतिमानव के रूप में तैयार करना चाहा लेकिन उन्होंने विद्रोह कर दिया। स्वयं देव प्राणों को उषा कहा गया है।

 पृथिवी से ऊर्ज के रूप में जो ऊर्जा द्युलोक को पहुंचती है, उसे धूम्र नाम भी दिया गया है। इसके कईं प्रकार कहे गए हैं। इसी तथ्य को कहने का दूसरा प्रकार यह है कि तुला का एक पक्ष अन्तर्मुखी चेतना है, एक बहिर्मुखी चेतना। इन दोनों की जहां संधि होती है, वहां तुला को स्थापित किया जाता है। वैदिक यज्ञ में दक्षिणाग्नि की स्थिति अन्तर्वेदी व बहिर्वेदी के मध्य में होती है। यह अन्तर्वेदी व बहिर्वेदी भी अन्तर्मुखी व बहिर्मुखी चेतना की प्रतीक हैं।

     तुला शब्द का एक रूप तुरा, तुरः हो सकता है। ऋग्वेद में तुरः, तुरासः आदि शब्द प्रकट होते हैं। तुरः शब्द के महत्त्व को तभी समझा जा सकता है जब इसके पूर्वरूपों तिरः व तरः को ध्यान में रखा जाए। तिरः का अर्थ है अपनी चेतना को अन्तर्मुखी कर लेना, तिरोहित हो जाना। इतनी सामर्थ्य आने के पश्चात् फिर चेतना को बहिर्मुखी करना भी आना चाहिए। दोनों प्रकार की चेतनाओं में एक संतुलन होना चाहिए। एक पुराण संदर्भ में उल्लेख है कि जितने बहिर्मुखी प्राण हैं, वह सब द्रविण का, धन का रूप हैं। तुला के एक पलडे में यजमान अपने इष्टदेव की स्वर्ण मूर्ति हाथ में लेकर उसे देखता हुआ तुला में आरोहण करता है। दूसरे पलडे में स्वर्ण आदि रखकर उसे तोला जाता है। इसका अर्थ हुआ कि स्वयं यजमान के रूप में उसकी अन्तर्मुखी स्थिति को तुला में रखा जा रहा है जबकि दूसरे पलडे में उसके बहिर्मुखी प्राणों को रखा जा रहा है जो अब धनात्मक बन चुके हैं। जितने प्राण धनात्मक बन चुके हैं, उनसे ही यजमान का तुलन करना है।

     तुरः से पूर्व और तिरः के पश्चात् साधना की एक स्थिति तरः की भी होनी चाहिए जिसमें हमें बाधाओं को तरना है, पार करना है।

संदर्भ

,०१८.०२  यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः ।

,०१८.०२ स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥

 ,०६१.०१  अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय ।

,०६१.०१ ऋचीषमायाध्रिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा ॥

,०६१.१३  अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः ।

,०६१.१३ युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून् ॥

,०६८.०९ पितुर्न पुत्राः क्रतुं जुषन्त श्रोषन्ये अस्य शासं तुरासः ॥

,०६८.१० वि राय और्णोद्दुरः पुरुक्षुः पिपेश नाकं स्तृभिर्दमूनाः ॥

,०९६.०८  द्रविणोदा द्रविणसस्तुरस्य द्रविणोदाः सनरस्य प्र यंसत् ।

,०९६.०८ द्रविणोदा वीरवतीमिषं नो द्रविणोदा रासते दीर्घमायुः ॥

,१२१.०३  नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट्तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून् ।

,१२१.०३ तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद्द्यां चतुष्पदे नर्याय द्विपादे ॥

,१२१.०५  तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू ।

,१२१.०५ शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः ॥

,१२१.०७  स्विध्मा यद्वनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः ।

,१२१.०७ यद्ध प्रभासि कृत्व्यां अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय ॥

,१६६.१४  येन दीर्घं मरुतः शूशवाम युष्माकेन परीणसा तुरासः ।

,१६६.१४ आ यत्ततनन्वृजने जनास एभिर्यज्ञेभिस्तदभीष्टिमश्याम् ॥

,१७१.०१  प्रति व एना नमसाहमेमि सूक्तेन भिक्षे सुमतिं तुराणाम् ।

,१७१.०१ रराणता मरुतो वेद्याभिर्नि हेळो धत्त वि मुचध्वमश्वान् ॥

,१७३.०९  असाम यथा सुषखाय एन स्वभिष्टयो नरां न शंसैः ।

,१७३.०९ असद्यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था ॥

,१६४.३०  अनच्छये तुरगातु जीवमेजद्ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम् ।

,१६४.३० जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः ॥

,००४.११  आ याह्यग्ने समिधानो अर्वाङिन्द्रेण देवैः सरथं तुरेभिः ।

,००४.११ बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम् ॥

,०४८.०४  उग्रस्तुराषाळ् अभिभूत्योजा यथावशं तन्वं चक्र एषः ।

,०४८.०४ त्वष्टारमिन्द्रो जनुषाभिभूयामुष्या सोममपिबच्चमूषु ॥

,०५४.१३  विद्युद्रथा मरुत ऋष्टिमन्तो दिवो मर्या ऋतजाता अयासः ।

,०५४.१३ सरस्वती शृणवन्यज्ञियासो धाता रयिं सहवीरं तुरासः ॥

,००३.०८  कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः ।

,००३.०८ प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान् ॥

,०२३.१०  ऋतं येमान ऋतमिद्वनोत्यृतस्य शुष्मस्तुरया उ गव्युः ।

,०२३.१० ऋताय पृथ्वी बहुले गभीरे ऋताय धेनू परमे दुहाते ॥

,०४०.०४  ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा ।

,०४०.०४ युक्त्वा हरिभ्यामुप यासदर्वाङ्माध्यन्दिने सवने मत्सदिन्द्रः ॥

,०४१.०५  प्र वो रयिं युक्ताश्वं भरध्वं राय एषेऽवसे दधीत धीः ।

,०४१.०५ सुशेव एवैरौशिजस्य होता ये व एवा मरुतस्तुराणाम् ॥

,०४२.०५  देवो भगः सविता रायो अंश इन्द्रो वृत्रस्य संजितो धनानाम् ।

,०४२.०५ ऋभुक्षा वाज उत वा पुरन्धिरवन्तु नो अमृतासस्तुरासः ॥

,०४३.०९  प्र तव्यसो नमउक्तिं तुरस्याहं पूष्ण उत वायोरदिक्षि ।

,०४३.०९ या राधसा चोदितारा मतीनां या वाजस्य द्रविणोदा उत त्मन् ॥

,०८६.०४  ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे ।

,०८६.०४ पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गिर्वणस्तमा ॥

,०१८.०४  सदिद्धि ते तुविजातस्य मन्ये सहः सहिष्ठ तुरतस्तुरस्य ।

,०१८.०४ उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रध्रतुरो बभूव ॥

,०२५.०५  नहि त्वा शूरो न तुरो न धृष्णुर्न त्वा योधो मन्यमानो युयोध ।

,०२५.०५ इन्द्र नकिष्ट्वा प्रत्यस्त्येषां विश्वा जातान्यभ्यसि तानि ॥

,०३२.०१  अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय ।

,०३२.०१ विरप्शिने वज्रिणे शन्तमानि वचांस्यासा स्थविराय तक्षम् ॥

,०३२.०५  स सर्गेण शवसा तक्तो अत्यैरप इन्द्रो दक्षिणतस्तुराषाट् ।

,०३२.०५ इत्था सृजाना अनपावृदर्थं दिवेदिवे विविषुरप्रमृष्यम् ॥

,०४४.०३  येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः ।

,०४४.०३ सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः ॥

,०४४.०५  यं वर्धयन्तीद्गिरः पतिं तुरस्य राधसः ।

,०४४.०५ तमिन्न्वस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः ॥

,०४८.१२  या शर्धाय मारुताय स्वभानवे श्रवोऽमृत्यु धुक्षत ।

,०४८.१२ या मृळीके मरुतां तुराणां या सुम्नैरेवयावरी ॥

,०४९.१२  प्र वीराय प्र तवसे तुरायाजा यूथेव पशुरक्षिरस्तम् ।

,०४९.१२ स पिस्पृशति तन्वि श्रुतस्य स्तृभिर्न नाकं वचनस्य विपः ॥

,०६६.०९  प्र चित्रमर्कं गृणते तुराय मारुताय स्वतवसे भरध्वम् ।

,०६६.०९ ये सहांसि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ॥

,०६८.०२  ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम् ।

,०६८.०२ मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना ॥

,००२.११  आ याह्यग्ने समिधानो अर्वाङिन्द्रेण देवैः सरथं तुरेभिः ।

,००२.११ बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम् ॥

,०२२.०५  न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान् ।

,०२२.०५ सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ॥

,०४०.०१  ओ श्रुष्टिर्विदथ्या समेतु प्रति स्तोमं दधीमहि तुराणाम् ।

,०४०.०१ यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामास्य रत्निनो विभागे ॥

,०४१.०२  प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता ।

,०४१.०२ आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥

,०५१.०१  आदित्यानामवसा नूतनेन सक्षीमहि शर्मणा शन्तमेन ।

,०५१.०१ अनागास्त्वे अदितित्वे तुरास इमं यज्ञं दधतु श्रोषमाणाः ॥

,०५६.१०  प्रिया वो नाम हुवे तुराणामा यत्तृपन्मरुतो वावशानाः ॥

,०५६.१९  इमे तुरं मरुतो रामयन्तीमे सहः सहस आ नमन्ति ।

,०५६.१९ इमे शंसं वनुष्यतो नि पान्ति गुरु द्वेषो अररुषे दधन्ति ॥

,०५८.०५  तां आ रुद्रस्य मीळ्हुषो विवासे कुविन्नंसन्ते मरुतः पुनर्नः ।

,०५८.०५ यत्सस्वर्ता जिहीळिरे यदाविरव तदेन ईमहे तुराणाम् ॥

,०६०.०८  यद्गोपावददितिः शर्म भद्रं मित्रो यच्छन्ति वरुणः सुदासे ।

,०६०.०८ तस्मिन्ना तोकं तनयं दधाना मा कर्म देवहेळनं तुरासः ॥

,०८६.०४  किमाग आस वरुण ज्येष्ठं यत्स्तोतारं जिघांससि सखायम् ।

,०८६.०४ प्र तन्मे वोचो दूळभ स्वधावोऽव त्वानेना नमसा तुर इयाम् ॥

,००३.१३  कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः ।

,००३.१३ नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः ॥

,०२६.०४  आ वां वाहिष्ठो अश्विना रथो यातु श्रुतो नरा ।

,०२६.०४ उप स्तोमान्तुरस्य दर्शथः श्रिये ॥

,०२७.०६  अभि प्रिया मरुतो या वो अश्व्या हव्या मित्र प्रयाथन ।

,०२७.०६ आ बर्हिरिन्द्रो वरुणस्तुरा नर आदित्यासः सदन्तु नः ॥

,०४१.०८  स समुद्रो अपीच्यस्तुरो द्यामिव रोहति नि यदासु यजुर्दधे ।

,०४१.०८ स माया अर्चिना पदास्तृणान्नाकमारुहन्नभन्तामन्यके समे ॥

,०६६.०५  यद्वावन्थ पुरुष्टुत पुरा चिच्छूर नृणाम् ।

,०६६.०५ वयं तत्त इन्द्र सं भरामसि यज्ञमुक्थं तुरं वचः ॥

,०७८.०७  क्रत्व इत्पूर्णमुदरं तुरस्यास्ति विधतः ।

,०७८.०७ वृत्रघ्नः सोमपाव्नः ॥

,०७९.०२  अभ्यूर्णोति यन्नग्नं भिषक्ति विश्वं यत्तुरम् ।

,०७९.०२ प्रेमन्धः ख्यन्निः श्रोणो भूत् ॥

१०,०२५.१०  अयं घ स तुरो मद इन्द्रस्य वर्धत प्रियः ।

१०,०२५.१० अयं कक्षीवतो महो वि वो मदे मतिं विप्रस्य वर्धयद्विवक्षसे ॥

१०,०३१.०१  आ नो देवानामुप वेतु शंसो विश्वेभिस्तुरैरवसे यजत्रः ।

१०,०३१.०१ तेभिर्वयं सुषखायो भवेम तरन्तो विश्वा दुरिता स्याम ॥

१०,०३५.१४  यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं त्रायध्वे यं पिपृथात्यंहः ।

१०,०३५.१४ यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः ॥

१०,०४९.११  एवा देवाँ इन्द्रो विव्ये नॄन्प्र च्यौत्नेन मघवा सत्यराधाः ।

१०,०४९.११ विश्वेत्ता ते हरिवः शचीवोऽभि तुरासः स्वयशो गृणन्ति ॥

१०,०५५.०८  युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा अशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट् ।

१०,०५५.०८ पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून् ॥

१०,०६१.११  मक्षू कनायाः सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित्तुरण्यन् ।

१०,०६१.११ शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः ॥

 १०,०७३.०१  जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमानः ।

१०,०७३.०१ अवर्धन्निन्द्रं मरुतश्चिदत्र माता यद्वीरं दधनद्धनिष्ठा ॥

१०,०९४.११  तृदिला अतृदिलासो अद्रयोऽश्रमणा अशृथिता अमृत्यवः ।

१०,०९४.११ अनातुरा अजरा स्थामविष्णवः सुपीवसो अतृषिता अतृष्णजः ॥

१०,०९६.०७  अरं कामाय हरयो दधन्विरे स्थिराय हिन्वन्हरयो हरी तुरा ।

१०,०९६.०७ अर्वद्भिर्यो हरिभिर्जोषमीयते सो अस्य कामं हरिवन्तमानशे ॥

(.५०.२ ) तुराणामतुराणां विशामवर्जुषीणाम् ।

(.५०.२ ) समैतु विश्वतो भगो अन्तर्हस्तं कृतं मम ॥२॥

(१२.२.४९ ) अहोरात्रे अन्वेषि बिभ्रत्क्षेम्यस्तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः ।

(१२.२.४९ ) अनातुरान्त्सुमनसस्तल्प बिभ्रज्ज्योगेव नः पुरुषगन्धिरेधि ॥४९॥

(२०.३१.२ ) अरं कामाय हरयो दधन्विरे स्थिराय हिन्वन् हरयो हरी तुरा ।

(२०.३१.२ ) अर्वद्भिर्यो हरिभिर्जोषमीयते सो अस्य कामं हरिवन्तमानशे ॥२॥

(२०.३५.१ ) अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय ।

(२०.३५.१ ) ऋचीषमायाध्रिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा ॥१॥

 

*इमौ वै लोकौ सहाऽऽस्ताम्; तौ व्यैताम्, नावर्षन्न समतपत्, ते पञ्चजना न समजानत, तौ देवाः समनयंस्तौ संयन्तावेतं देवविवाहं व्यवहेतां, रथंतरेणैवेयममूं जिन्वति, बृहताऽसाविमाम्। नौधसेनैवेयममूं जिन्वति, श्यैतेनासाविमां; धूमेनैवेयममूं जिन्वति, वृष्ट्याऽसाविमां; देवयजनमेवेयममुष्यामदधात्, पशूनसावस्याम्। एतद्वा इयममुष्यां देवयजनमदधाद् यदेतच्चन्द्रमसि कृष्णमिव। तस्मादापूर्यमाणपक्षेषु यजन्त एतदेवोपेप्सन्ते। ऊषानसावस्यां तद्धापि तुरः कावषेय उवाचोषः पोषो जनमेजय केति; तस्माद्धाप्येतर्हि गव्यं मीमांसमानाः पृच्छन्ति सन्ति तत्रोषाः3 इति। ऊषो हि पोषोऽसौ वै लोक इमं लोकमभिपर्यावर्त्तते। ततो वै द्यावापृथिवी अभवतां न द्यावाऽन्तरिक्षात् नान्तरिक्षाद् भूमिः। - ऐ.ब्रा. 4.27

*बृहच्च वा इदमग्रे रथंतरं चास्तां; वाक्च वै तन्मनश्चाऽऽस्तां; वाग्वै रथंतरं; मनो बृहत्, तद् बृहत् पूर्वं ससृजानं रथंतरमत्यमन्यत; तद्रथंतरं गर्भमधत्त, तद्वैरूपमसृजत। ते द्वे भूत्वा रथंतरं च वैरूपं च बृहदत्यमन्येताम्, तद् बृहद् गर्भमधत्त, तद्वैराजमसृजत। ते द्वे भूत्वा बृहच्च वैराजं च, रथंतरं च वैरूपं चात्यमन्येतां तद्रथंतरं गर्भमधत्त, तच्छाक्वरमसृजत। तानि त्रीणि भूत्वा रथंतरं च वैरूपं च शाक्वरं च, बृहच्च वैराजं चात्यमन्यन्त तद् बृहद् गर्भमधत्त, तद्रैवतमसृजत। तानि त्रीण्यन्यानि त्रीण्यन्यानि षट्पृष्ठान्यासन्। - ऐ.ब्रा. 4.28

*अथ हैषैव तुला। यद्दक्षिणो वेद्यंतः। स यत्साधु करोति तदंतर्वेदि। अथ यदसाधु तद्बहिर्वेदि। तस्माद्दक्षिणं वेद्यंतमधिस्पृश्येवासीत। तुलायां ह वा अमुष्मिंल्लोक आदधति। यतरद्यंस्यति। तदन्वेष्यति। यदि साधु वाऽसाधु वेति। अथ य एवं वेद। अस्मिन् हैव लोके तुलामारोहति। अत्यमुष्मिँल्लोके तुलाधानं मुच्यते। साधुकृत्या हैवास्य यच्छति; न पापकृत्या। - मा.श. 11.2.7.33

(११,१.१) ओमथातस्तुलापुरुषविधिं व्याख्यास्यामः

(११,१.२) तदुदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्ये नक्षत्रे श्रद्धाप्रेरितौ ग्रहणकाले वा

(११,१.३) ऋत्विग्यजमानौ कॢप्तकेशश्मश्रू रोमनखानि वापयित्वा

(११,१.४) संभारानुपकल्प्य प्राक्तन्त्रमाज्यभागान्तं कृत्वा

(११,१.५) महाव्याहृतिसावित्रीशान्तिं ब्रह्म जज्ञानमिति हुत्वा

(११,१.६) अग्ने गोभिरग्नेऽभ्यावर्तिन्नग्नेः प्रजातमिति संपातानुदपात्रानीयाभिषेककलशेषु निनयेद्

(११,१.७) अथास्येन्द्रो ग्रावभ्यामित्यभिषेचयेद्

(११,१.८) इदमापो यथेन्द्रो बाहुभ्यामित्यभिषेचयित्वा

(११,१.९) यथोक्तमञ्जनाभ्यञ्जनानुलेपनं कारयित्वा वासो गन्धस्रजश्चाबध्नीयात्

(११,१.१०) तुलां हिरण्यं च पवित्रैरभ्युक्ष्य पुरुषसंमितोऽर्थ इति सप्तभिस्तदारोहयेद्

(११,१.११) अच्युता द्यौरिति चतसृभिरवरोहयेत्

(११,१.१२) सूर्यस्यावृतमिति प्रदक्षिणमावृत्य ब्राह्मणेभ्यो निवेदयित्वात्मालंकारान् कर्त्रे दद्यात्

(११,१.१३) सहस्रदक्षिणं ग्रामवरम्

(११,१.१४) द्विजानन्नेन तर्पयेत्

(११,१.१५) अथ चेन्निःस्वपक्षेण यथा संपद्यते धनम् । धातुभिः सह तौल्यं तु वासोभिश्च रसैस्तथा । व्रीह्यादिसप्तधान्यैर्वा यथासंपद्यते गृहे ॥

(११,२.१) सखड्गः सशिरस्त्राणः सर्वाभरणभूषितः । तपनीयमग्रे कृत्वा पश्चात्तोल्यो नराधिपः ॥

(११,२.२) इन्द्रेणेदं पुरा दत्तमधिराज्याप्तये वरम् । सर्वपापप्रणाशाय सर्वपुण्यविवृद्धये ॥

(११,२.३) महादानातिदानानामिदं दानमनुत्तमम् । अक्षय्यफलदं श्रेष्ठं दातॄणां श्रेयवर्धनम् ॥

(११,२.४) यत्पापं स्वे कुले जातैस्त्रिः सप्त पुरुषैः कृतम् । तत्सर्वं नश्यते क्षिप्रमग्नौ तूलं यथा तथा ॥

(११,२.५) अनामयं स्थानमवाप्य दैवैरलङ्घनीयं सुकृतैर्हिरण्मयैः । सुवर्णतेजाः प्रविमुक्तपापो दिवीन्द्रवद्राजति सूर्यलोके ॥ दिवीन्द्रवद्राजति सूर्यलोकेति ॥ इति तुलापुरुषविधिः समाप्तः ॥ - अथर्वपरिशिष्टं

 

यदिन्द्र शासो अव्रतं च्यावया सदसस्परि। अस्माकमँशुं मघवन्पुरुस्पृह वसव्ये अधि बर्हय।।

 

 

 

तुला अग्नि २५५.३४ (तुला द्वारा सत्यानृत परीक्षा), पद्म १.५०.६८ (तुलाधार : सत्य और समभाव की प्रशंसा में तुलाधार नामक वैश्य का आख्यान), ६.८८.१६ (सत्यभामा द्वारा तुलापुरुष दान का कथन), ब्रह्माण्ड २.३.१३.७ (ब्रह्मतुण्ड ह्रद में तुला की स्थिति -- तुला तु दृश्यते तत्र धर्मान्धर्मनिदर्शिनी । यथा वै तोलितं विप्रैस्तीर्थानां फलमुत्तमम् ॥ २,१३.७५ ॥),

भविष्य २.१.१७.७ (तुलापुरुष दान में अग्नि का धाता नाम), ३.४.१२. (शनि के दर्शन मात्र से बाल गणेश का शिर रहित होना, सूर्य के तुला राशिस्थ होने पर चन्द्रमण्डल में स्थित शिर का २७ दिनों तक भूतल पर प्रकाशित होना), ४.१७५ (तुला दान विधि, तुलापुरुष दान -- यदेतद्द्रविणं नाम प्राणाश्चैते बहिश्चराः ।। १९ ।।तस्माद्बहिश्चरैः प्राणैरात्मा योज्यः सदा बुधैः ।।), मत्स्य १९६.६(तौलेय : आङ्गिरस? गोत्रकारों में से एक) २७४ (तुला दान विधि -- मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तुते।योऽसौ तत्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ।। २७४.६२, धर्मराजमथादाय हैमं सूर्य्येण संयुतम्। कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम्।। २७४.६६),  लिङ्ग २.२८.१५ (तुला पुरुष दान विधि), विष्णुधर्मोत्तर ३.३२८.३३ (तुला द्वारा दिव्यता परीक्षा), शिव ५.१.२५ (तुला पुरुष दान, तुलादान का माहात्म्य), स्कन्द १.२.४४.३२ (तुला द्वारा दिव्यता परीक्षा), ५.१.८.६७ (अप्सरस तीर्थ में तिल, लवण, शर्करा, गुड तथा मधु से स्वयं का तुलन करने पर भिन्न - भिन्न फलों की प्राप्ति का कथन -- लवणेन स्वरूपाढ्यस्तिलैः सर्वांगशोभनः ।। ६८ ।। द्रव्यवृद्धिः शर्करया गुडेनांगेषु पूर्णता ।। मधुना चैव सौभाग्यं तीर्थस्यास्य प्रभावतः ।। ६९ ।।), ५.३.१५५.८९ (तुलाकूट : मानकूट, तुलाकूट व कूटक कहने से अन्धतामिस्र नरक की प्राप्ति), ६.२६७ (तुला पुरुष दान का माहात्म्य - ब्रह्मणो दुहिता नित्यं सत्यं परममाश्रिता॥ काश्यपी गोत्रतश्चैव नामतो विश्रुता तुला॥24 त्वं तुले सत्यनामासि स्वभीष्टं चात्मनः शुभम्॥ करिष्यामि प्रसादं मे सांनिध्यं कुरु सांप्रतम्॥25 ), लक्ष्मीनारायण २.१२१.९९ (तुलायन :मेषायन, वृष आदि द्वादश महर्षियों में से एक, रुद्र - पुत्र, ब्रह्मा द्वारा र, त वर्ण प्रदान), ३.१२५.६७ (तुलापुरुष दान विधि का निरूपण ; तुला व लूता में सम्बन्ध का कथन), कथासरित् १०.४.२३७ (लौह तुला (तराजू ) व वैश्यपुत्र की कथा ) । tulaa

 

शब्दकल्पद्रुम --

मेषादि- द्वादशराश्यन्तर्गतसप्तमराशिः । तत्पर्य्यायः । यूकः २ युक् ३ धटः ४ तौली ५ तुलाभृत् ६ । इति ज्योतिषम् ।।

सा चित्राशेषपादद्वय स्वातीसमुदाययुक्त विशाखाप्रथमपादत्रयेण भवति। तदधिष्ठातृदेवता तुलाधारिपुरुषः।

अस्याः  शिरस उदयः नानावर्णं उष्णस्वभावः । सा पश्चिमदिक्स्वामिनी वायुराशिः स्निग्धा चिक्कणा निःशब्दा वनचारिणी अल्पसन्ताना अल्पस्त्रीसङ्गा शूद्रवर्णा समानाङ्गा च । तत्र जातस्य फलम् । वक्ता विद्यावरः स्त्रीदुःखितः। इति जातकम् जन्मकालीचन्द्राश्रितैतद्राशिफलम्।

'' वृषतुरङ्गगजक्रयविक्रयो  द्विजसुरार्च्चनदानमनाः पुमान् ।

शशिनि तौलिगते बहुदारभाग्विभवसञ्चितचित्रितविक्रमः ।। ''

इति कोष्ठीप्रदीपः ।।

तस्या उदये तन्नामकलग्नं  भवति ।    तत्र जातफलम् ।

तुलालग्ने पुमान् जातः सुधीः  सत्कर्मतत्परः ।

विद्वान् सर्व्वकलाविज्ञो धनाढ्यो जनपूजितः ।। '' इति कोष्ठप्रदीपः ।। 

तस्य द्रव्यविशेषेण फलं यथा-

''अष्टानामपि धातूनां यस्तुलां कुरुते नरः ।

सर्व्वपापैः प्रमुच्येत मनोवाक्कायसम्भवैः ।

यावद्धातु स्थितं तत्र तावत् कोटिशतानि च ।

मोदते तत्र वर्षाणां स्वर्गलोके न संशयः ।।

अथ मानुष्यमाक्रम्य कदाचित् कालपर्य्यये ।

धनधान्यसमृद्धो वै जायते महतां कुले ।।

आत्मनस्तु तुलां कृत्वा सुवर्णं यः प्रयच्छति ।

स तारयेत् पितृगणान् दश पूर्व्वान् दशापरान्।।

आत्मनस्तु तथा तद्वत् फलभाग्जायते नरः ।

जन्मप्रभृति यत् पापं मातृकं पैतृकं तथा ।।

सुवर्णदानात् दारिद्र्यं न पश्यति कदाचन ।

रजतस्य तुलां कृत्वा सुकृती यः प्रयच्छति ।।

तावद्वर्षप्रमाणेन निर्मलः स्वर्गभाग्भवेत् ।

अनन्तरं भवेद्राजा पृथिव्यां नात्र संशयः ।।

सुवर्णहारी कुष्ठी वा सर्व्वव्याधियुतोऽपि वा ।

ताम्रस्य तु तुलां कृत्वा मुच्यते नात्र संशयः ।।

स तु वर्षसहस्रं वै स्वर्गलोके महीयते ।

कांस्यस्य तु तुलां कृत्वा विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति ।।

स तु इन्द्रपदं प्राप्य ऊर्व्वश्या सह मोदते ।

आयसस्य तुलां कृत्वा दाता रत्नाधिपो भवेत् ।।

लभते ह्युत्तमस्थानं बलवान् जायते सदा ।

रैत्यस्य त तुलां कृत्वा यो ददाति द्विजातये ।।

सोऽपसरःशतसंकीर्णे विमाने दिवि मोदते ।

सीसकस्य तुलां कृत्वा यो ददातीह मानवः।।

स गन्धर्व्वपदं गच्छेत् नानाभरणभूषितः ।

रङ्गस्य तु तुलां कृत्वा विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति ।।

विमुक्तः सर्व्वपापेभ्यचन्द्रसायुज्यमाप्नुयात् ।

घृतस्य तु तुलां कृत्वा ये प्रयच्छन्ति मानवाः ।।

तेजस्विनोऽभिजायन्ते गोभिश्च चिरजीविनः ।

तैलस्य तु तुलां कृत्वा यो वै दद्याद् द्विजातये ।।

अरोगित्वं सुखित्वं वै आयुष्मानपि जायते ।

अन्नदः सर्व्वसौभाग्यं सर्व्वान् कामान् मधुप्रदः ।।

अनेन विघिना यस्तु तुलापुरुषमाचरेत् ।

प्रतिलोकाधिपस्थाने प्रतिमन्वन्तरं वसेत् । - इति दानसागरः