पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Tunnavaaya   to Daaruka )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar)

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Tunnavaaya - Tulaa ( words like Tumburu, Turvasu, Tulasi, Tulaa/balance etc.)

Tulaa - Triteeyaa (Tushaara, Tushita, Tushti/satisfaction, Trina/straw, Trinabindu, Triteeya/third day etc. )

Triteeyaa - Taila  (Trishaa/thirst, Trishnaa/craving, Teja/brilliance, Taittira, Taila/oil etc.)

Taila - Trayyaaruna ( Tondamaana, Torana, Toshala, Tyaaga, Trayee, Trayodashee, Trayyaaruna etc.)

Trasadashva - Tridhanvaa  ( Trasadasyu, Trikuuta, Trita, Tridhanvaa etc.)

Tridhaamaa - Trivikrama  (Trinetra, Tripura, Trivikrama etc. )

Trivishta - Treeta (Trivishtapa, Trishanku, Trishiraa, Trishtupa etc.)

Tretaa - Tvishimaan (Tretaa, Tryambaka, Tvaritaa, Twashtaa etc.)

Tvishta - Daksha ( Danshtra/teeth, Daksha etc. )

Daksha - Danda (Daksha, Dakshasaavarni, Dakshina/south/right, Dakshinaa/fee,   Dakshinaagni, Dakshinaayana etc. )

Danda - Dattaatreya (Danda/staff, Dandaka, Dandapaani, Dandi, Dattaatreya etc.)

Dattaatreya - Danta ( Dattaatreya, Dadhi/curd, Dadheechi/Dadhichi, Danu, Danta/tooth etc.)

Danta - Damayanti ( Danta / teeth, dantakaashtha, Dantavaktra / Dantavakra, Dama, Damana, Damaghosha, Damanaka , Damayanti etc. )

Damee - Dashami  ( Dambha/boasting, Dayaa/pity, Daridra/poor, Darpana/mirror, Darbha,  Darsha, Darshana, Dashagreeva etc.)

Dasharatha - Daatyaayani (Dashami/tenth day, Dasharatha, Dashaarna, Dashaashvamedha etc. )

Daana - Daana ( Daana)

Daanava - Daaru (Daana, Daama, Daamodara etc.)

 

 

Words twesha and twishi appear in vedic mantras. Their meanings can be derived from the root twish  which means luminescence or light. From description of brahmanic literature, it appears that the crude form of twesha is our basic qualities like hunger, anger etc. These basic forms can be converted into superior qualities which may help our senses decide the true or false nature of objects in nature.

     One interesting aspect of twishi is it’s placement in heart. It seems that in heart, twishi is a synonym for intellect. Heart is the abode of love. Placing intellect there may be useful in deciding the true or false nature of object. In puraanic literature, Budha has been said to be son of twishi. The story of puranas where there is an ambiguity whether Budha is son of moon or Brihaspati is well know.

     In one upanishadic text, twishi has been equated with a grinding stone on which cereals are crushed so that these may take the form of best food, or in other words, so that different airs like praana, apaana etc. may be introduced into these. And a maid wants to get hold of this grinding stone. Dr. Radha Gupta thinks that the maid in this anecdote is nothing but our higher intellect which has been suppressed by lower intellect.

प्रथम लेखन – १८-९-२०१० ई( भाद्रपद शुक्ल एकादशी, विक्रम संवत् २०६७)

त्विषि

टिप्पणी-- त्विष धातु दीप्ति अर्थ में है । वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से दो शब्द प्रकट होते हैं – त्विषि और त्वेष । त्विषि शब्द में व उदात्त है, जबकि त्वेष में ष ।  शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन संहिता २८.४० का कथन है –

त्रिष्टुभा छन्दसेन्द्रियं त्विषिमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज ।।

इस यजु में कहा जा रहा है कि इन्द्र में इन्द्रिय त्विषि की स्थापना त्रिष्टुप् छन्द द्वारा की गई । इस त्विषि का रूप वयः, पक्षी जैसा है । माध्यन्दिन संहिता १९.९२ का कथन है कि –

आत्मन्नुपस्थे न वृकस्य लोम मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम ।

केशा न शीर्षन्यशसे श्रियै शिखा सिँहस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि ।।

 इस यजु से प्रतीत होता है कि इन्द्रियां त्विषि हैं । इसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि, जैसा कि पहले भी अन्य टिप्पणियों में कहा जा चुका है, रसायन विज्ञान में दो रसायनों के मिश्रण से ऊष्मा का अवशोषण या निर्गमन हो सकता है । मातृका विज्ञान में ऊष्मा के निर्गमन को ऊष्माण वर्णों श, ष, स तथा ह द्वारा सूचित किया जाता है जबकि ऊष्मा के अवशोषण को य, र, ल, व द्वारा । हमारे शरीर की सारी क्रियाएं ऊष्मा के निर्गमन द्वारा संचालित होती हैं । भोजन से एल्कोहल बनता है, एल्कोहल के अणु के टूटने से ऊष्मा का जनन होता है । वह ऊष्मा हमारे शरीर को मिलती है । दूसरी ओर, डा. एस.टी. लक्ष्मीकुमार ने अपनी पुस्तक A Quest for New Materials(Vigyan Prasar, New Delhi) में प्रतिपादित किया है कि शरीर को जो ऊष्मा मिलती है, वह रक्त में उपस्थित लौह कण के आक्सीकरण अथवा उपचयन और अपचयन प्रक्रिया के फलस्वरूप मिलती है । इसका अर्थ है कि जब लौह कण फेफडों में आक्सीजन का अवशोषण करता है, तब उसकी संयोजकता ५ होती है । जब वह अवशोषित आक्सीजन को शरीर में स्थांतरित कर देता है, तब उसकी संयोजकता ३ हो जाती है । इस अपचयन प्रक्रिया में बहुत कम मात्रा में ऊष्मा का जनन होता है जिससे सारे शरीर की क्रिया संचालित होती है । यदि इस ऊष्मा का नियन्त्रण किया जाए तो यह त्विषि, दीप्ति, प्रकाश में बदल सकती है, ऐसा यजुओं से प्रतीत होता है ।

माध्यन्दिन संहिता २०.५ का कथन है कि –

शिरो मे श्रीर्यशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि ।

इस यजु में त्विषि को केश और श्मश्रुओं का रूप दिया जा रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि जो ऊष्मा इन्द्रियों के उपयोग से अतिरिक्त रह जाती है, वह केश और श्मश्रुओं का रूप धारण करती है । अथवा ऐसा कहा जा सकता है कि जो ऊष्मा दीप्ति में, त्विषि में परिवर्तित नहीं हो पाती, वह केश और श्मश्रु का रूप धारण करती है ।

माध्यन्दिन संहिता २१.३५ का कथन है –

होता यक्षत्सुपेशसोषे नक्तं दिवाश्विना समञ्जाते सरस्वत्या त्विषिमिन्द्रे न भेषजं श्येनो न रजसा हृदा श्रिया न मासरं पयः इत्यादि ।

इस यजु से संकेत मिलता है कि सरस्वती देवी इन्द्र की चिकित्सा त्विषि भेषज द्वारा करती है । यह त्विषि ऐसे है जैसे रजोगुण युक्त हृदय के द्वारा श्येन । यहां प्रतीत होता है कि त्विषि को श्येन का, सुपर्ण का रूप दिया जा रहा है । श्येन का निर्माण तभी हो सकता है जब स्थूलता, पाप समाप्त हो । माध्यन्दिन संहिता २१.५३ का कथन है –

वषट्कारैः सरस्वती त्विषिं न हृदये मतिँ होतृभ्यां दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ।।

इस यजु से संकेत मिलता है कि सरस्वती ने हृदय में मति की स्थापना ऐसे की जैसे इन्द्रिय में त्विषि की स्थापना की जाती है । यह कार्य सरस्वती ने वषट्कार द्वारा किया ।

यजुर्वेद की यजुओं में तो केवल परोक्ष रूप से ही त्विषि को श्येन का रूप दिया गया है । शतपथ ब्राह्मण १२.७.१.६ तथा १२.७.२.१५ में तो और भी अधिक प्रत्यक्ष रूप से त्विषि को श्येन का रूप दिया गया है । कहा गया है कि जब इन्द्र ने अनुपहूत होते हुए भी त्वष्टा के यज्ञ का सोम पी लिया तो त्विषि उसके उर या हृदय से अपाष्ठिहा श्येन के रूप में बाहर निकल गई । इस त्विषि को इसके मूल स्थान पर पुनः स्थापित करके इन्द्र की चिकित्सा करनी है । हृदय मूल रूप से प्रेम का स्थान है । यजुओं में त्विषि को मति कहा जा रहा है । इससे संकेत मिलता है कि हृदय में केवल प्रेम ही पर्याप्त नहीं है । वहां बुद्धि की भी प्रतिष्ठा होनी चाहिए । वायु पुराण ५३.८१ में बुध के त्विषि – पुत्र होने का उल्लेख है । बुध बोध की स्थिति है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि सोम की त्विषि सर्वश्रेष्ठ है –

सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् । - माध्यन्दिन संहिता १०.५

तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.८.१ तथा शतपथ ब्राह्मण ५.३.५.३ में राजसूय याग में अभिषेक के संदर्भ में शार्दूल चर्म को बिछाते समय कहा जाता है कि – सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् । कहा गया है कि जो सोम में त्विषि है, जो शार्दूल में है, उसकी ही प्राप्ति की जाती है । साथ ही साथ शार्दूल को मृत्यु का वर्ण कहा गया है । यह विचित्र है कि एक ओर शार्दूल को मृत्यु का वर्ण कहा जा रहा है, दूसरी ओर उसकी त्विषि का, चर्म की प्राप्ति का प्रयत्न किया जा रहा है । शर्द धातु कुत्सित शब्द अर्थ में है और इसको अपान वायु द्वारा किए गए शब्द के रूप में दर्शित किया गया है । इस शब्द का नियन्त्रण करने वाला शार्दूल हो सकता है । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.८.७ में अध्वर्यु ऋत्विज द्वारा पर्णमय(पलाश) पात्र से राजा के अभिषेक के संदर्भ में कहा गया है कि इससे ब्रह्मवर्चस और त्विषि को धारण कराते हैं । इस संदर्भ में यह अन्वेषणीय है कि क्या ब्रह्मवर्चस को ही त्विषि कहा गया है । यदि ऐसा है कि तो हमारे पास एक ओर सोम की त्विषि है, दूसरी ओर ब्रह्मवर्चस की त्विषि है । यह उल्लेख पुराणों के इस आख्यान का हल कर सकता है कि बुध सोम का पुत्र है या बृहस्पति का ।

इतिहासोपनिषद १२ः१८ में एक आख्यान दिया गया है । राजा शिबि के पास पांच रत्न हैं जिन्हें वह इतिहास जानने वाले ब्राह्मण को देना चाहता है । इनमें से एक रत्न के बारे में राजा ने कहा कि – त्विषिर्मे अजस्रं पिनष्टि । अर्थात् मेरी त्विषि अनवरत् रूप से पीसती रहती है । ब्राह्मण की दासी की इच्छा है कि वह दृषद रूपी इस रत्न को प्राप्त कर ले । श्रीमती राधा का अनुमान है कि दासी से तात्पर्य हमारी सात्विक बुद्धि से है जो तमोगुणी व रजोगुणी बुद्धियों की दासी बनी हुई है । सामान्य रूप से सोचें तो मति द्वारा पेषण का कार्य उचित – अनुचित के ज्ञान के रूप में होता है । यज्ञ कार्य में दृषद द्वारा पेषण का कार्य इस प्रकार होता है कि इस पर पीसे गए अन्न में प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान प्राणों का प्रवेश कराना होता है ।

अथर्ववेद २०.१०७.२ का कथन है –

ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत् समवर्तत । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ।।

अथर्ववेद ४.३१.२ का कथन है –

अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि ।

अर्थात् हे मन्यु नामक बल, त्विषित किए जाने पर तू अग्नि की भांति सह बल वाला बन । इन मन्त्रों से संकेत मिलता है कि त्विषि की स्थिति ओज और मन्यु बलों में रूपान्तरण लाती है ।

     जैमिनीय ब्राह्मण २.४०५ में आजि धावन के संदर्भ में आजि धावन करने वालों को सन्नद्ध अर्थात् अस्त्र – शस्त्रों से सज्जित कहा गया है । यह परम त्विषि का रूप कहा गया है । पुराणों में उल्लेख आता है कि त्वष्टा ने सूर्य के अतिरिक्त तेज को काट – छांट कर देवों के अस्त्रों का निर्माण किया ।

     शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.१० में ५ प्रयाजों में से प्रथम प्रयाज के लक्षण के रूप में त्विषि का उल्लेख है –

त्विषिरेव प्रथमः प्रयाजः। अपचितिर्द्वितीयो यशस्तृतीयो ब्रह्मवर्चसं चतुर्थोऽन्नाद्यं पञ्चमः

     तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.८.७.३ में अश्वमेध के संदर्भ में अध्वर्यु द्वारा छह दिशाओं में अश्व के प्रोक्षण का कथन है । उपरि दिशा में प्रोक्षण सर्वदेवों की सहायता से त्विषि व हर की प्रतिष्ठा के लिए किया जाता है (सर्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य इत्युपरिष्टात् । सर्वे वै देवास्त्विषिमन्तो हरस्विनः ) । पूर्व दिशा में प्रजापति के द्वारा अन्नाद व अन्नाद्य की प्रतिष्ठा के लिए, दक्षिण दिशा में इन्द्राग्नि द्वारा ओज व बल की प्रतिष्ठा के लिए, पश्चिम् दिशा में वायु के आशु गुण द्वारा जव की प्रतिष्ठा के लिए, उत्तर दिशा में विश्वेदेवों की सहायता से यश की प्रतिष्ठा के लिए और अधोदिशा में देवों की सहायता से अपचिति की प्रतिष्ठा के लिए प्रोक्षण किया जाता है । यह संदर्भ इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि सौत्रामणि याग में यश, ओज, अपचिति, त्विषि आदि सभी का इन्द्र से पतन होता है और यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा गुण क्या कार्य करता है । दिशाओं के सापेक्ष चिन्तन करने पर यह समस्या हल हो जाती है । तैत्तिरीय आरण्यक ४.१०.२ ५.८.६ में प्रवर्ग्य के संदर्भ में उल्लेख आता है –

त्विष्यै त्वा । द्युम्नाय त्वा । इन्द्रियाय त्वा भूत्यै त्वा । इसके सायण भाष्य में कहा गया है कि हे प्रवर्ग्य, त्विषि प्राप्ति के लिए मैं तेरा प्राची दिशा में होम करता हूं, द्युम्न सिद्धि के लिए दक्षिण दिशा में, इन्द्रिय अभिवृद्धि के लिए प्रतीची दिशा में और भूति प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में ।

ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.४ में वैश्वसृज होम के संदर्भ में नेष्टा ऋत्विज का तादात्म्य त्विषि से स्थापित किया गया है—

त्विषिश्चापचितिश्च नेष्टापोतारौ

 नेष्टा के लिए नेष्टा शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है ।

ऋग्वेद ५.६३.६ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.५.४ में निम्नलिखित मन्त्र प्रकट हुआ है –

वाचं सु मित्रावरुणाविरावतीं पर्जन्यश्चित्रां वदति त्विषीमतीम् ।

अभ्रा वसत मरुतः सु मायया द्यां वर्षयतमरुणामरेपसम् ।।

अर्थात् पर्जन्य इरावती, चित्रा, त्विषीमती वाक् बोलता या करता है । मरुत माया या प्रज्ञा द्वारा मेघों द्वारा आच्छादन करते हैं । हे मित्रावरुणौ, अरुणा, पापरहित द्यौ में वर्षा करो । इस ऋचा में पर्जन्य की वाक् को चित्रा और त्विषीमती कहा गया है । चित्रा से संकेत मिलता है कि यह वाक् अभी पापरहित नहीं हुई है, यह चित्र – विचित्र स्थिति में है ।  इस ऋचा का विनियोग वृष्टि हेतु मैत्रावरुण कर्म में कहा गया है ।

     भागवत पुराण ८.१८.२, १०.३.१०, १०.६.५, १०.१८.२७, १०.४६.४५ में त्विषि शब्द प्रकट हुआ है और इन सभी स्थानों पर इसका उपयोग कर्ण कुण्डल की दीप्ति या त्विषि के रूप में किया गया है । सौत्रामणि याग में उल्लेख आता है कि इन्द्र ने त्वष्टा के यज्ञ में जो सोम अनुपहूत होकर पिया, वह सोम या इन्द्रिय वीर्य उसके विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार से स्रवित हुआ । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.८.५.२ के अनुसार जो नाक से स्रवित हुआ, वह सिंह रूप में स्रवित हुआ, अक्षियों से शार्दूल रूप में और कर्णों से वृक रूप में । शुक्ल यजुर्वेद १९.९२ तथा शतपथ ब्राह्मण में यह स्रवण थोडा भिन्न प्रकार से कहा गया है(आत्मन्नुपस्थे न वृकस्य लोम मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम । केशा न शीर्षन्यशसे श्रियै शिखा सिंहस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि) । सौत्रामणि याग में त्विषि रूप इन इन्द्रिय वीर्यों की पुनः इन्द्र में स्थापना की जाती है । इस स्थापना हेतु इन आरण्यक पशुओं के लोम मात्र का ग्रहण किया जाता है ।

 

 पर्णमयेनाध्वर्युरभिषिञ्चति । ब्रह्मवर्चसमेवास्मिन्त्विषिं दधाति । औदुम्बरेण राजन्यः । ऊर्जमेवास्मिन्नन्नाद्यं दधाति । आश्वत्थेन वैश्यः । विशमेवास्मिन्पुष्टिं दधाति । नैयग्रोधेन जन्यः । मित्राण्येवास्मै कल्पयति । - तैब्रा. १.७.८.७

आत्मन्नुपस्थे न वृकस्य लोम मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम ।
केशा न शीर्षन् यशसे श्रियै शिखा सिंहस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि ॥ - काठक सं ३८.३

सौत्रामणी -- शिरो मे श्रीर्यशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि । काठक सं ३८.४

    

त्वेष

त्विष धातु दीप्ति अर्थ में है । वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से दो शब्द प्रकट होते हैं – त्विषि और त्वेष । त्विषि शब्द में व उदात्त है, जबकि त्वेष में ष ।  अथर्ववेद १९.४७.१ का कथन है –

दिवः सदांसि बृहती वि तिष्ठसे आ त्वेषं वर्तते तमः ।।

अर्थात् त्वेष होने तक तमः की स्थिति रहती है (तुलनीय – कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान – ऋग्वेद १०.८९.२) ।

माध्यन्दिन संहिता ५.८ का यजु निम्नलिखित है –

या ते अग्नेअयःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोअपावधीत्त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा । या ते अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत्त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा । या ते अग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत्त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा ।।

इस यजु की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण ३.४.४.२३ में सायणाचार्य द्वारा की गई है । उपसद इष्टि में पहले चार दिन अयःशया वाले भाग का उच्चारण किया जाता है, अगले चार दिन रजःशया वाले भाग का और अन्तिम चार दिन हरिशया वाले भाग का । यह तीन इस प्रकार हैं जैसे पुराणों में त्रिपुर के तीन पुर । इस यजु में उग्र वाक् कौन सी है और त्वेष वाक् कौन सी है, इसकी व्याख्या तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.९.५ में मिलती है । अशनापिपासा उग्र वाक् हैं । एनः और वैरह्त्या त्वेष वाक् हैं । त्वेष और द्वेष में क्या समानताएं हैं, क्या असमानताएं हैं, यह अन्वेषणीय है ।

तैत्तिरीय संहिता २.७.१२.३ में मरुतों के उग्र त्वेष का आह्वान किया गया है (अव त्वेषमुग्रमव ईमहे वयम् )। इस संदर्भ में उग्र त्वेष कौन सा होगा, यह अन्वेषणीय है ।

माध्यन्दिन संहिता १६.५० का कथन है –

परि नो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु परि त्वेषस्य दुर्मतिरघायोः ।

इस यजु में प्रार्थना की जा रही है कि अघायु के त्वेष की दुर्मति हमसे दूर रहे ।

तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.१.१२ में हव्यवाहन अग्नि के त्वेष चक्षु का उल्लेख है (त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्वति) । ऋग्वेद ५.८.६ में यह पाठ त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्मति है ।

माध्यन्दिन संहिता ११.३६ का यजु निम्नलिखित है –

नि होता होतृषदने विदानस्त्वेषो दीदिवाँ असदत्सुदक्षः।

अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः ।।

इस यजु की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण ६.४.२.७ में की गई है । कहा गया है कि अग्नि होता है, कृष्णाजिन होतृसदन है। यजु से प्रतीत होता है कि त्वेष को ही आगे अग्नि का रूप देकर सुदक्ष कहा गया है जो अदब्धव्रत है, प्रमति है, वसिष्ठ है इत्यादि । ऊपर त्विषि की तुलना मति से की गई है, यहां त्वेष की तुलना प्रमति से की जा रही है । इसे सुदक्ष भी कहा जा रहा है ।

माध्यन्दिन संहिता १२.४८ के अनुसार –

अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र ।

येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः ।।

इस यजु की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.२३ में उपलब्ध है । इस यजु में त्वेष को भानु कहा गया है । सामान्य तर्क से यह कहा जा सकता है कि यदि त्विषि मति या बुद्धि है तो त्वेष मस्तिष्क हो सकता है ।

यास्क के निरुक्त में त्विषि या त्वेष के संदर्भ में कह दिया गया है कि यह शब्द वैदिक निघण्टु में नहीं है, तथापि इसका अर्थ दीप्ति आदि हो सकता है । ऋग्वेद ७.१००.३ (तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.३.५) की ऋचा निम्नलिखित है –

त्रिर्देवः पृथिवीमेष एतां वि चक्रमे शतर्चसं महित्वा ।

प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम ।।

 

इस ऋचा में कामना की गई है कि पृथिवी की तीन परिक्रमा करने वाला त्रिविक्रम विष्णु तवीयों में तवः हो, विष्णु के स्थविर रूप का नाम त्वेष है । ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक निघण्टु में त्वेष का समावेश तवः शब्द के अन्तर्गत कर लिया गया है । तवः शब्द का वर्गीकरण निघण्टु में बल नामों में किया गया है । लोकभाषा में रोटी को सेकने के लिए जिस स्थाली का उपयोग किया जाता है, उसे तवा कहते हैं । अग्नि की ऊष्मा को ताव भी कहते हैं । क्रोधयुक्त हो जाने को ताव में आ जाना भी कहते हैं ।

ऋग्वेद ६.२.६ ऋचा का एक पद निम्नलिखित है –

त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि षञ्शुक्र आततः ।

इस ऋचा से प्रतीत होता है कि जब अग्नि का धूम त्वेष ग्रहण कर लेता है तो वह द्युलोक में शुक्र बन जाता है ।

ऋग्वेद ६.३.८ के अनुसार –

शर्धो वा यो मरुतां ततक्ष ऋभुर्न त्वेषो रभसानो अद्यौत् ।।

इस ऋचा में त्वेष की तुलना ऋभु से की जा रही है । डा. फतहसिंह का अनुमान है कि ऋभु मर्त्य स्तर पर ज्ञान का प्रतीक है ।

ऋग्वेद ५.८७.६ में त्वेष शव का उल्लेख है । शवस् की गणना वैदिक निघण्टु में बल नामों में की गई है ।

 तैत्तिरीय ब्राह्मण २.८.९.२ में सूर्य व चन्द्र को त्वेषदर्शता कहा गया है ।

 

In puraanic literature, Twashtaa is the carpenter of gods. He cuts the light energy into different forms of weapons of gods. Twashaa word can be explained on the basis of word twishi and twesha. In vedic mantras, Twashtaa has been stated to churn the form/roopa. But how he does it, has not been stated.

त्वष्टा

टिप्पणी सरस्वतीकण्ठाभरणम् २.१.१४७ का सूत्र है –

त्विषेर्देवतायामितोच्च ।

इस सूत्र की दण्डनाथनारायण वृत्ति में कहा गया है कि त्विषेर्देवतायामर्थे तृन्प्रत्यय इकारस्य चाकार आदेशो भवति । अर्थात् त्विषि शब्द में त्वि के इ का रूपान्तर अ में होकर त्वष्टा शब्द निर्मित होता है । अतः त्वष्टा को समझने के लिए त्विषि शब्द को समझना उपयुक्त होगा ।

ऋग्वेद .१८८., .१०२., १०.१८४., अथर्ववेद .२५., .२५.१०, .२६., .. आदि में त्वष्टा द्वारा रूप के पिंशन/पीसने के उल्लेख आए हैं यह रहस्यमय प्रतीत होता है कि त्वष्टा रूप का पिंशन किस प्रकार करता है त्वष्टा शब्द त्विष - दीप्तौ धातु से बना है तैत्तिरीय संहिता ... ..१०. के अनुसार सोम द्वारा रेतः का धारण किया जाता है और  त्वष्टा उस रेतः से रूपों का वि-करण करता है तैत्तिरीय ब्राह्मण ... का कथन है कि त्वष्टा रेतः में रूपों को विकरोति/निर्माण करता है वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से कहा गया है कि पर्जन्य वृष्टि द्वारा पृथिवी पर रेतः सिंचन होता है वृष्टि पृथिवी के लिए योनि में रेतः सिंचन जैसी है उस रेतः से अन्न की सृष्टि होती है अथर्ववेद ११../११.. में उल्लेख आता है कि उच्छिष्ट में नाम रूप आहित हैं, छिपे हुए हैं डा. फतहसिंह का कहना है कि उच्छिष्ट/जूठन शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का, संचित वीर्य आदि का प्रतीक है पुराणों में उल्लेख आता है कि जब सूर्य का तेज बहुत प्रखर हो गया तो त्वष्टा ने अपने चक्र पर सूर्य को कर उसके तेज को काटा - छांट इस काट - छांट से जो तेज निकला, उससे देवों के अस्त्रों का निर्माण किया जैमिनीय ब्राह्मण .२५९ का कथन है कि प्रजापति ही उद्गाता है, वही त्वष्टा है, वही रेतस् का सिंचन करने वाला है, वही रूपों का विकर्ता है उद्गाता शब्द की टिप्पणी में यह उल्लेख किया गया है कि हमारे सभी प्राण दिव्य अन्न की प्राप्ति की अभीप्सा करते हैं, जैसे मण्डूक पर्जन्य वर्षण की लेकिन आवश्यकता इस बात की होती है कि मुख्य प्राण इस अभीप्सा में सम्मिलित हो जाए वही उद्गाता कहलाता है तैत्तिरीय ब्राह्मण ..१२. के अनुसार त्वष्टा इन्द्र में यश और श्री का भरण करता है

पराङ् वा एतर्हि यज्ञः पराचीर्देवतास्त्वाष्ट्रो भवति पराचीष्वेव देवतासु त्वष्टारं वृषाणमपिसृजति – काठ ३०.१

त्वष्टावरूत्री आस्तामसुरब्रह्मौ ता असुरा अब्रुवन्निमानि मनुकपालानि याचेथामिति- काठ ३०.१, क ४६.४

त्वष्टृ

इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये।

अस्माकमस्तु केवलः॥ १.०१३.१०

अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना ।
त्वं हि रत्नधा असि ॥
(दे. त्वष्टा) - ऋ. १.१५.

अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप।

त्वष्टारं सोमपीतये॥ १.०२२.०९

अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष।

वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः॥ १.०३२.०२

ह्रदं न हि त्वा न्यृषन्त्यूर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना।

त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम्॥ १.०५२.०७

अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं रणाय।

वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः॥ १.०६१.०६

अभिष्टने ते अद्रिवो यत्स्था जगच्च रेजते।

त्वष्टा चित्तव मन्यव इन्द्र वेविज्यते भियार्चन्ननु स्वराज्यम्॥ १.०८०.१४

त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्ययं सहस्रभृष्टिं स्वपा अवर्तयत्।

धत्त इन्द्रो नर्यपांसि कर्तवेऽहन्वृत्रं निरपामौब्जदर्णवम्॥ १.०८५.०९

तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरु वारं पुरु त्मना।

त्वष्टा पोषाय वि ष्यतु राये नाभा नो अस्मयुः॥ १.१४२.१०

चकृवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन्।

यदावाख्यच्चमसाञ्चतुरः कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तर्न्यानजे॥ १.१६१.०४

हनामैनाँ इति त्वष्टा यदब्रवीच्चमसं ये देवपानमनिन्दिषुः।

अन्या नामानि कृण्वते सुते सचाँ अन्यैरेनान्कन्या नामभिः स्परत्॥ १.१६१.०५

उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः।

आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः॥ १.१८६.०६

त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे ।
तेषां न स्फातिमा यज ॥
१.१८८.

त्वमग्ने त्वष्टा विधते सुवीर्यं तव ग्नावो मित्रमहः सजात्यम्।

त्वमाशुहेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शर्धो असि पुरूवसुः॥ २.००१.०५

 त्वष्टा फलस्य साधु संपादयिता

पिशङ्गरूपः सुभरो वयोधाः श्रुष्टी वीरो जायते देवकामः।

प्रजां त्वष्टा वि ष्यतु नाभिमस्मे अथा देवानामप्येतु पाथः॥ २.००३.०९

विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नःसाम्नः कविः।

स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि॥ २.०२३.१७

अमेव नः सुहवा आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन।

अथा मन्दस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवेभिर्जनिभिः सुमद्गणः॥ २.०३६.०३

तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व।

यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः॥ ३.००४.०९

उग्रस्तुराषाळभिभूत्योजा यथावशं तन्वं चक्र एषः।

त्वष्टारमिन्द्रो जनुषाभिभूयामुष्या सोममपिबच्चमूषु॥ ३.०४८.०४

शिवस्त्वष्टरिहा गहि विभुः पोष उत त्मना।

यज्ञेयज्ञे न उदव॥ ५.००५.०९

अभि वो अर्चे पोष्यावतो नॄन्वास्तोष्पतिं त्वष्टारं रराणः।

धन्या सजोषा धिषणा नमोभिर्वनस्पतीँरोषधी राय एषे॥ ५.०४१.०८

अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृतच्छताश्रिम्।

निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणगृजीषिन्॥ ६.०१७.१०

उत स्य देवः सविता भगो नोऽपां नपादवतु दानु पप्रिः।

त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः सजोषा द्यौर्देवेभिः पृथिवी समुद्रैः॥ ६.०५०.१३

तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व।

यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः॥ ७.००२.०९

आ यन्नः पत्नीर्गमन्त्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान्॥ ७.०३४.२०

प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूयुः॥ ७.०३४.२१

ता नो रासन्रातिषाचो वसून्या रोदसी वरुणानी शृणोतु।

वरूत्रीभिः सुशरणो नो अस्तु त्वष्टा सुदत्रो वि दधातु रायः॥ ७.०३४.२२

अयं यथा न आभुवत्त्वष्टा रूपेव तक्ष्या ।
अस्य क्रत्वा यशस्वतः
(दे. अग्निः)८.१०२.

त्वष्टारमग्रजां गोपां पुरोयावानमा हुवे।

इन्दुरिन्द्रो वृषा हरिः पवमानः प्रजापतिः॥ ९.००५.०९

आ नः पूषा पवमानः सुरातयो मित्रो गच्छन्तु वरुणः सजोषसः।

बृहस्पतिर्मरुतो वायुरश्विना त्वष्टा सविता सुयमा सरस्वती॥ ९.०८१.०४

त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीतीदं विश्वं भुवनं समेति।

यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश॥ १०.०१७.०१

आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यति ष्ठ।

इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा दीर्घमायुः करति जीवसे वः॥ १०.०१८.०६

मह्यं त्वष्टा वज्रमतक्षदायसं मयि देवासोऽवृजन्नपि क्रतुम्।

ममानीकं सूर्यस्येव दुष्टरं मामार्यन्ति कृतेन कर्त्वेन च॥ १०.०४८.०३

अहं तदासु धारयं यदासु न देवश्चन त्वष्टाधारयद्रुशत्।

स्पार्हं गवामूधस्सु वक्षणास्वा मधोर्मधु श्वात्र्यं सोममाशिरम्॥ १०.०४९.१०

त्वष्टा माया वेदपसामपस्तमो बिभ्रत्पात्रा देवपानानि शंतमा।

शिशीते नूनं परशुं स्वायसं येन वृश्चादेतशो ब्रह्मणस्पतिः॥ १०.०५३.०९

त्वष्टारं वायुमृभवो य ओहते दैव्या होतारा उषसं स्वस्तये।

बृहस्पतिं वृत्रखादं सुमेधसमिन्द्रियं सोमं धनसा उ ईमहे॥ १०.०६५.१०

देव त्वष्टर्यद्ध चारुत्वमानड्यदङ्गिरसामभवः सचाभूः।

स देवानां पाथ उप प्र विद्वाँ उशन्यक्षि द्रविणोदः सुरत्नः॥ १०.०७०.०९

य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा।

तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्॥ १०.११०.०९

अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥ १०.१२५.०२

विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।

आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥१०.१८४.१

विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥
५.२५.

त्वष्टः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः ।
पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे ॥
५.२५.११

त्वष्टा युनक्तु बहुधा नु रूपा अस्मिन् यज्ञे युनक्तु सुयुजः स्वाहा ॥ ५.२६.

बृहस्पतिः सविता ते वयो दधौ त्वष्टुर्वायोः पर्यात्मा त आभृतः ।
अन्तरिक्षे मनसा त्वा जुहोमि बर्हिष्टे द्यावापृथिवी उभे स्ताम् ॥
९.४.१० {}

आयुरस्मै धेहि जातवेदः प्रजां त्वष्टरधिनिधेहि अस्मै ।

रायस्पोषं सवितरा सुवास्मै शतं जीवाति शरदस्तवायम् ॥शौअ २.२९.२

धाता रातिः सवितेदं जुशन्तामिन्द्रस्त्वष्टा प्रति हर्यन्तु मे वचः ।

हुवे देवीमदितिं शूरपुत्रां सजातानां मध्यमेष्ठा यथासानि ॥३.८.२

गोसनिं वाचमुदेयं वर्चसा माभ्युदिहि ।

आ रुन्धां सर्वतो वायुस्त्वष्टा पोषं दधातु मे ॥३.२०.१०॥

त्वष्टा दुहित्रे वहतुं युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति ।

व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा ॥३.३१.५

त्वष्टा युनक्तु बहुधा नु रूपा अस्मिन् यज्ञे युनक्तु सुयुजः स्वाहा ॥५.२६.८

तन् नस्तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु ।

देव त्वष्टा रायस्पोषं वि ष्य नाभिमस्य ॥५.२७.१०

पातां नो देवाश्विना शुभस्पती उषासानक्तोत न उरुष्यताम् ।

अपां नपादभिह्रुती गयस्य चिद्देव त्वष्टर्वर्धय सर्वतातये ॥६.३.३

त्वष्टा मे दैव्यं वचः पर्जन्यो ब्रह्मणस्पतिः ।

पुत्रैर्भ्रातृभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रायमाणं सहः ॥६.४.१

सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं शिवेन ।

त्वष्टा नो अत्र वरीयः कृणोत्वनु नो मार्ष्टु तन्वो यद्विरिष्टम् ॥६.५३.३

त्वष्टा जायामजनयत्त्वष्टास्यै त्वां पतिम् ।

त्वष्टा सहस्रमायूंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम् ॥६.७८.३

यं परिहस्तमबिभरदितिः पुत्रकाम्या ।

त्वष्टा तमस्या आ बध्नाद्यथा पुत्रं जनाद्॥६.८१.३

धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपतिर्नो अग्निः ।

त्वष्टा विष्णुः प्रजया संरराणो यजमानाय द्रविणं दधातु ॥७.१८.४/७.१७.४॥

१. अग्न्युपस्थानस्य अग्निहोत्राङ्गता -- रेतः सिक्तं न त्वष्ट्राऽविकृतम् प्र जायते यावच्छो वै रेतसः सिक्तस्य ॥ त्वष्टा रूपाणि विकरोति तावच्छो वै तत् प्र जायत एष वै दैव्यस् त्वष्टा यो यजते बह्वीभिर् उप तिष्ठते रेतस एव सिक्तस्य बहुशो रूपाणि वि करोति । तैसं ,,, ।।

२३. सोमस्याहं देवयज्यया सुरेता रेतो धिषीय त्वष्टुरहं देवयज्यया पशूनां रूपं पुषेयम् । तैसं ,,,

१४. त्वाष्ट्रं वडबम् आ लभेत पशुकामस्  त्वष्टा वै पशूनां मिथुनानां  रूपकृत् ( प्रजनयिता [ तैसं. !)। तैसं , , ,;; तै ३,,११,२।।

चित्रायागः -- प्रैवाऽऽग्नेयेन वापयति रेतः सौम्येन दधाति रेत एव हितं त्वष्टा रूपाणि वि करोति  - तैसं २.४.६.१

१०.  रेतः सौम्येन दधाति रेत एव हितं त्वष्टा रूपाणि विकरोति । तैसं ,,, ( तु. मै १, १०,; , ,; , ; , ,; तै २,,,१ ) ।

सोमं यजति रेत एव तद् दधाति त्वष्टारं यजति रेत एव हितं त्वष्टा रूपाणि वि करोति – तैसं २.६.१०.३

८. ......त्वष्टा रूपाणाम् (अधिपतिः) । तैसं , ,, ।।

 इन्द्रतन्वाख्या इष्टकाः -- ऋषभेण त्वष्टा (यज्ञं दाधार) – तैसं ४.४.८.१

त्वष्टा वीरं देवकामं जजान त्वष्टुर् अर्वा जायत आशुर् अश्वः ।
त्वष्टेदं विश्वम् भुवनं जजान बहोः कर्तारम् इह यक्षि होतः ॥
तैसं  ,,११,

२५. त्वष्टुर्दशमी (नवमी [तैसं.J) । तैसं ५,,२२,; मै ३,१५,; काठ ५३,१२

१७. असुर्यं वा एतस्माद्वर्णं कृत्वा । पशवो वीर्यमपक्रामन्ति । यस्य यूपो विरोहति । त्वाष्ट्रं बहुरूपमालभेत । त्वष्टा वै रूपाणामीशे । य एव रूपाणामीशे । सोऽस्मिन्पशून्वीर्यं यच्छति । नास्मात्पशवो वीर्यमप क्रामन्ति । (°मीष्टे [माश.J) । तै , , , ;

११. त्वष्टा रूपेण नवमे (अहन् प्रायुङ्क्त) । तै , , ,

राजसूये संसृपां हविः -- पुरस्तादुपसदाँ सौम्येन प्रचरति । सोमो वै रेतोधाः । रेत एव तद्दधाति । अन्तरा त्वाष्ट्रेण । रेत एव हितं त्वष्टा रूपाणि विकरोति । उपरिष्टाद्वैष्णवेन । यज्ञो वै विष्णुः । - तैब्रा १.८.१.२

४. त्वष्टा पशूनां मिथुनानां  रूपकृद्रूपपतिः । तै , , , ।।

सौत्रामणेः कौकिल्या हौत्रम् -- होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रं देवम् । भिषज सुयजं घृतश्रियम् । पुरुरूप सुरेतसं मघोनिम् । इन्द्राय त्वष्टा दधदिन्द्रियाणि । वेत्वाज्यस्य होतर्यज । - तै २.६.७.४

त्वष्टा दधदिन्द्राय शुष्मम् । अपाकोऽर्चिष्टुर्यशसे पुरूणि । वृषा यजन्वृषणं भूरिरेताः । मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान् । - तै २.६.८.४

होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रमश्विना । भिषजं न सरस्वतीम् । ओजो न जूतिरिन्द्रियम् । वृको न रभसो भिषक् । यशः सुरया भेषजम् - तै २.६.११.

अश्विना भेषजं मधु । भेषजं नः सरस्वती । इन्द्रे त्वष्टा यशः श्रियम् । रूप रूपमधुः सुते । - तैब्रा. २.६.१२.४

प्रयाजार्थं मैत्रावरुणप्रैषाः -- होता यक्षत्सुरेतसम् । त्वष्टारं पुष्टिवर्धनम् । रूपाणि बिभ्रतं पृथक् । पुष्टिमिन्द्रं वयोधसम् द्विपदं छन्द इहेन्द्रियम् । उक्षाणं गां न वयो दधत् । वेत्वाज्यस्य होतर्यज । - तैब्रा २.६.१७.६

२. त्वष्टः समिधां पते...आ रुचा रोचे ऽहं  स्वयम् । तै , ११, ,

१९. (चार दिशाओं में इन्द्र, मनोजवस्, प्रचेता, विश्वकर्मा) त्वष्टा वो रूपैरुपरिष्टादुपदधताम् । तैआ ,२०, ।।

सोमो दीक्षया ( १) । त्वष्टेध्मेन । विष्णुर्यज्ञेन । - तैआ ३.८.१

त्वष्टेध्मेन (सहागच्छतु) – तैआ ३.८.२

२६. त्वष्टुर्ह वै पुत्रः त्रिशीर्षा षडक्ष आस तस्य त्रीण्येव मुखान्यासुस्तद्यदेवं रूप आस

तस्माद्विश्वरूपो नाम ।......स त्वष्टा चुक्रोध । कुविन्मे पुत्रमवधीदिति सोऽपेन्द्रमेव सोममाजह्रे - माश ,,,; ,,,।।

१८. पत्नीसंयाजः -- अथ सोमं यजति । रेतो वै सोमो रेत एवैतत्सिञ्चति तस्मात्सोमं यजति त्वष्टा वै सिक्तं  रेतो विकरोति । ..... अथ देवानां पत्नीर्यजति । पत्नीषु वै योनौ रेतः प्रतिष्ठितं - माश ,,,१०; (तु. कौ ३,९)।

अथ पत्नीभ्यः पत्नीयूपमुच्छ्रयन्ति । सर्वत्वाय न्वेव पत्नीयूप उच्छ्रीयते तत्त्वाष्ट्रं पशुमालभते त्वष्टा वै सिक्तं रेतो विकरोति – माश ३.७.२.८

१३. त्वष्टा वै पशूनामीष्टे । माश ३,,,११ ।।

२१. यत्र वै देवाः । अग्रे पशुमालेभिरे तं त्वष्टा शीर्षतोऽग्रेऽभ्युवामोतैवं चिन्नालभेरन्निति त्वष्टुर्हि पशवः स एष शीर्षन्मस्तिष्कोऽनूक्यश्च मज्जा तस्मात्स वान्त इव त्वष्टा ह्येतमभ्यवमत्तस्मात्तं नाश्नीयात्त्वष्टुर्ह्येतदभिवान्तम् - । काश ४,,,; माश ,,,११

पात्नीवतग्रहः -- सजूर्देवेन त्वष्ट्रेति । त्वष्टा वै सिक्तं रेतो विकरोति तदेष एवैतत्सिक्तं रेतो विकरोति – माश ४.४.२.१६

अथ त्वाष्ट्रं दशकपालं पुरोडाशं निर्वपति । त्वष्टा वै रूपाणामीष्टे त्वष्ट्रैव तद्रूपैर्वरुणोऽनुसमसर्पत्तथो एवैष एतत्त्वष्ट्रैव रूपैरनुसंसर्पति तत्रैकं पुण्डरीकं प्रयच्छति – माश ५.४.५.[८]

७. वैश्वकर्मणं पुरुषं वारुणमश्वमैन्द्रमृषभं त्वाष्ट्रमविमाग्नेयमजम् - माश ६.२.१.[५]

अथोत्तरतोऽविम् । वरूत्रीं त्वष्टुर्वरुणस्य नाभिमिति वारुणी च हि त्वाष्ट्री चाविरविं जज्ञानां रजसः परस्मादिति श्रोत्रं वै परं रजो दिशो वै श्रोत्रं परं रजो – माश ७.५.२.२०

९. त्वष्टा (श्रियः) रूपाणि (आदत्त) । माश ११, ,,

त्वष्टा पशुकामा आधत्त , त इमे त्वाष्ट्राः पशवः प्राजायन्त , तेन ऋद्धं – मै १.७.२

३. त्वष्टा पशुकाम (°मा मै.J) आधत्त, त इमे त्वाष्ट्राः पशवः । मै १,,; काठ ८,१५

५. त्वष्टा वै भूत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत त्वष्टा यजमानस्स यद्वाचावदत् तदभवद्यद्वै वाचा वदति तद्भवति। काठ , १० । ।

प्रजापतिर् एष यद् उद्गाता। स त्वष्टा स रेतसस् सेक्ता स रूपाणां विकर्ता। - जै १.२५९

त्रिशीर्षा ह वै त्वाष्ट्र आस। तस्य ह त्रीणि मुखान्य् आसुस् सोमपानम् एकं सुरापानम् एकम् अन्नादनम् एकम्। प्रस्तौति ह स्मैकेनैकेन गायति प्रतिहरत्य् एकेनाश्रावयत्य् एकेन प्रत्याश्रावयत्य् एकेन शंसत्य् एकेन । स ह स्मैकात्येवानुपरि सर्वं यज्ञं संस्थापयति। सहेयद्वीर्यावान् आस। स उ हासुरीपुत्र आस। स ह स्म प्रत्यक्षं देवेभ्यो वदति, परोक्षम् असुरेभ्यः। यस्मा उ ह वै भूयः कामयते तस्मै परोक्षं वदति। तस्माद् उ हेन्द्रो बिभयांचकार यच् चासुरीपुत्र आस, यद् उ चेयद्वीर्यावान् आस। स हेक्षांचक्रे - असुर्यो वा अयम् आसुरीपुत्रः। स प्रत्यक्षम् अस्मभ्यं वदति परोक्षम् असुरेभ्यः। हन्तैनं हनानीति॥जै २.१५३

तस्य ह वज्रेण शीर्षाणि प्रचिच्छेद। तान्य् एव वयांस्य् अभवन्। तद् यत् सोमपानम् आसीत् स कपिञ्जलो ऽभवत्। तस्मात् स बभ्रुर् इव। बभ्रुर् इव हि सोमः। अथ यत् सुरापानम् आसीत् स कलविंको ऽभवत्। तस्मात् स मत्त इवावक्रन्दति। अथ यद् अन्नादनम् आसीत् स तित्तिरिर् अभवत्। तस्मात् स बहुरूप इव। बहुरूपम् इव ह्य् अन्नम्। । - जै २.१५४

६. स त्वष्टा हतपुत्रो ऽपेन्द्रं सोमम् आजह्रे। ....तं ह वज्रहस्तो ऽभिदुद्राव। स त्वष्टा प्रत्यङ् पतित्वा पत्नीः प्रपेदे। तं ह तत्र नानुप्रपेदे। तस्मात् त्वष्टारं पत्नीषु संयजन्ति।। जै , १५५

विराजम् अभ्यक्रन्दत्। ततो ऽप्सरसो ऽसृजत त्वष्टृमुखाः। - जै ३.३८१

७. सोमो रेतोधास्तस्याहं देवयज्यया सुरेतोधा रेतो धिषीय त्वष्टा रूपाणां विकर्ता तस्याहं देवयज्यया विश्वरूपं प्रियं पुषेयं। काठ ,

त्वष्टा दधदिन्द्राय शुष्ममपाकोऽचिष्टुर्यशसे पुरूणि ।
वृषा यजन् वृषणं भूरिरेता मूर्धन् यज्ञस्य समनक्तु देवान् ॥- मै ३.११.१(सौत्रामणी)

१२. त्वष्टा रेतो भुवनस्य पत्नीर्विकृण्वानास्तनयं भूरिपश्वः । मै ,१४,

१५. त्वष्टा वै भूत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । काठ ७, १० ।

१६. असुर्यं वा एतस्माद्वर्णं कृत्वा तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं प्रजाः पशवोऽपक्रामन्ति यस्य यूपो विरोहति …..त्वाष्ट्रं पशुं बहुरूपमालभेत त्वष्टा वै ( + पशूनां [ता.1) रूपाणां विकर्ता । काठ ३२,; क ४४,; तां , १०,

२०. त्वष्टा समिधा (सहागच्छतु) । मै ,,; काठ ९, १० ।

त्वाष्ट्रं विपुँसकमालभेत प्रजाकामो वा पशुकामो वा प्रजापतिर्वै प्रजास्सिसृक्षमाणस्स द्वितीयं मिथुनं नाविन्दत स एतद्रूपं कृत्वाङ्गुष्ठेनात्मानँ समभवत् ततः प्रजा असृजत त्वष्टा मिथुनस्य प्रजनयिता – काठ सं. १३.७

२२ त्वष्टा वीरं देवकामं जजान त्वष्टुरर्वा जायत आशुरश्वः ।
त्वष्टेदं विश्वं भुवनं जजान बहोः कर्तारमिह यक्षि होतः ॥
काठ ४६, (तु.

२४. त्वष्टुरुन्नीयमानम् (पयः) । मै १,,१०।

२७. देवा असुराणां वेशत्वमुपायन् , इन्द्रस्तु नाप्युपैत् , तेषां वा इन्द्रियाणि वीर्याण्यपाक्रामन् , अग्ने रथंतरम् , इन्द्रस्य बृहत् , विश्वेषां देवानां वैरूपं , सवितुर्वैराजं , त्वष्टू रेवती, मरुतां शक्वरी, तानि वा इन्द्रोऽन्वपाक्रामत् , तैरात्मानं अभिसमयुङ्क्त, तैरभवत् । मै , ,; काठ १२,५।

२८. त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा, त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा । काठ ४३,५ ।।

२९. भद्रस्त्वष्टा विदधद्रूपाण्यद्भुतः । काठसंक ६० : ४ ।

३०. त्वष्टा पत्नीभिरिह नः सजोषा देवो देवीभिर्हविषो जुषाणः ।
उपो रयिं बहुलं विष्यता नः शृणोत नः सुमतिं यज्ञियासः ॥
रेतोधा यस्य भुवनस्य देवः ससाद योनौ जनिता जनिष्ठः ।
रूपाणि कृण्वन् विदधद्वपू
षि त्वष्टा पत्नीभिश्चरति प्रजानन् ॥
त्वष्टा पत्नीभिरनु मंहनेवाग्रेयावा धिषणे यं दधाते ।
विश्वा वसु हस्तयोरादधानोऽन्तर्मही रोदसी याति साधन् ॥
आ नो वीरेभिर्जनिता मतीनां गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्वसूयन् ।
समञ्जानो धामभिर्विश्वरूपैस्त्वष्टा पत्नीभिश्चरति प्रजानन् ॥
त्वष्टा रेतो भुवनस्य पत्नीर्विकृण्वानास्तनयं भूरि पश्वः ।
ग्ना वो देवी रोदसी तच् शृणोता नो रयिं जनत विश्ववारं ॥
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां च रयिं च नो जनत विश्वरूपं ।
योनौ रेतो दधदस्मे नु त्वष्टा देवीः पत्नीर्जनत जीवसे नः ॥
मै ,१४,

३१. आप्रीसूक्तम् -- वाग्वै त्वष्टा वाग्धीदं सर्वं ताष्टीव । ऐ २.४

३२. यत् त्वाष्ट्रः, संवत्सरो वै त्वष्टा, संवत्सर एवान्वैच्छन् (यज्ञं)। मै ,, ।।

त्वष्टाग्नीत् – मै १.९.१, काठ९.८,  तैआ ३.३.१

त्वष्ट्रे ऽजाम् (दद्यात्) तैआ १.१०.३

त्वष्टाऽधिपतिः मै ३.६.९

ग्ने पत्नीरिहा वहेति नेष्टा यजति त्वष्टारं सोमपीतय इतीन्द्रो वै त्वष्टा तदैन्द्रं रूपं– ऐ ६.१०

त्वष्टा त्वा रूपैरुपरिष्टात् पातु  - काठ २.९

त्वष्ट्रा उष्ट्रान् (आलभते) – मै ३.१४.१०

त्वष्ट्रे कौलीकान् (आलभते) मै ३.१४.५

चित्रा नक्षत्रं , त्वष्टा देवता – मै २.१३.२० (तु. काठ ३९.१३)

त्वष्टा तूर्णमश्नुत इति नैरुक्तास्त्विषेर्वा स्याद्वृद्धिकर्मणस्त्वक्षतेर्वा स्यात्करोतिकर्मणः' (निरु. ८. १३)

 

त्वाष्ट्र

१. कौम्भीनसः पुष्करसादो लोहिताहिस्ते त्वाष्ट्राः । काठ ४७,४।

२. छगलः कल्माषः किकिदिवीविदीगयस् ( °दीविर्विदी° तैसं.] ) तौ त्वाष्ट्रौ ( ते त्वाष्ट्राः तैसं.)। तैसं ५,,२२,; काठ ५०,२।

३. त्वाष्ट्रं वडबमालभेत पशुकामः (प्रजाकामः [गो.J) । तैसं २,,,; गो २,,१ ।

४. त्वाष्ट्रं  शुण्ठमालभेत । काठ १३,५।।

५. त्वाष्ट्रं दशकपालं पुरोडाशं (श्रीरपश्यत् ) । माश ११,,,५।।

६. त्वाष्ट्रं दशकपालं पुरोडाशं निर्वपति । माश ५,,,८ ।

८. त्वाष्ट्रमष्टाकपालम् (+ शुण्ठो दक्षिणा [तैसं १, ,१७,१])। तैसं १, , १७, ; २०, (तु. मै २,,१३; काठ १५,;३७,३ )।

९. त्वाष्ट्रा वै पशवस्त्वष्टा पशूनां प्रजनयिता। मैसं २, ,५ ( तु. तैसं. १, ,,; ,,११,; मै ४,,१ )।

१०. त्वाष्ट्राणि वै रूपाणि । माश २,,,४।।

११. त्वाष्ट्रौ लोमशसक्थौ । काठ ४८,२ ।।

१२. त्वाष्ट्रौ लोमसक्थौ सक्थ्योः । मै ३,१३,२।

१३. प्लीहाकर्णः शुण्ठाकर्णोऽधिरूढाकर्णस्ते त्वष्ट्राः। मै ३,१३,५ ।

१४. रेतःसिक्तिर्वै त्वाष्ट्रः । कौ १९, ६ ॥

कलविङ्कः पुष्करसादो लोहितास्ते त्वाष्ट्राः  - मै ३.१४.१२

  

त्वाष्ट्री-सामन्

त्वाष्ट्रीसाम भवति इन्द्रं वा अक्ष्यामयिणं भूतानि नास्वापयंस्तमेतेन त्वाष्ट्रयोऽस्वापयंस्तद्वाव तास्तर्ह्यकामयन्त कामसनि साम त्वाष्ट्रीसाम काममेवैतेनावरुन्धे इन्द्रो वृत्राद्बिभ्यद्गां प्राविशत् तं त्वाष्ट्रयोऽब्रुवं जनयामेति तमेतैः सामभिरजनयं जायामहा इति वै सत्त्रमासते जायन्त एव तां १२,,१९-२१

४. अथ त्वाष्ट्रीसाम मध्येनिधनं भवति प्रतिष्ठायै। समुद्रं वा एतेनारम्भणं प्रप्लवन्ते य आर्भवं पवमानम् उपयन्ति। तद् यन् मध्येनिधनं भवति प्रतिष्ठित्या एव। तस्य पुरस्तान् निधनस्य प्रतिहारम् उपयन्ति। प्रस्तावप्रतिहाराभ्यां वै यजमानो धृतः। प्रद्रुतम् इवैतद् अहर् यत् त्रिवृत्। तद् यत् पुरस्तान् निधनस्य प्रतिहारम् उपयन्त्य् अप्रस्रंसायैव। इन्द्रो वृत्रं वज्रेणाध्यस्य नास्तृषीति मन्यमानो गाः प्राविशत्। ता अकामयन्तेन्द्रं जनयेमेति। ता एतानि सामान्य् अपश्यंस् त्वाष्ट्रीसामानि। तैर् इन्द्रम् अजनयन्। तानि वा एतानि वीरजननानि सामानि । आस्य वीरो जायते य एवं वेद। अथो पशवो वै त्वाष्ट्र्यः। तद् यद् एतानि सामानि भवन्ति पशूनाम एवावरुद्ध्यै। तद् ऐळं भवति - पशवो वा इळा - पशूनाम् एवावरुद्ध्यै। यद् उ त्वाष्ट्र्यो ऽपश्यंस् तस्मात् त्वाष्ट्रीसामेत्य् आख्यायते। । जै , १९ ।।

१. द्वादशाहे तृतीयमहः-- अथ त्वाष्ट्रीसाम वीरजननं साम। अस्य वीरो जायते य एवं वेद। अथो चतुर्थस्यैवाह्नः प्रजात्यै। प्रजननं ह्य् एतद् यत् त्वाष्ट्रीसाम। तन् मध्येनिधनं भवति प्रतिष्ठायै।  जै , ५४